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गुरु (guru), अध्यात्म (meditation), SPIRITUALISM 09827546483

शास्त्रों के मुताबिक ईश्वर का ज्ञान स्वरूप व शक्ति गुरु के रूप में पूजनीय है। इसलिए गुरु की सेवा, भक्ति व शक्ति को ही बुद्धि और विवेक से जीवन की तमाम परेशानियों से उबारने वाला माना गया है।

हिंदू धर्म परंपराओं में गुरु व परब्रह्म के विलक्षण स्वरूप में त्याग, तप, ज्ञान व प्रेम की साक्षात् मूर्ति भगवान दत्तात्रेय को माना जाता है। वे महायोगी व त्रिदेव ब्रह्मा, विष्णु व महेश का त्रिगुण स्वरूप भी माने जाते हैं। लिखा गया है कि –

पौराणिक मान्यता के मुताबिक ब्रह्मदेव के मानस पुत्र महर्षि अत्रि व कर्दम ऋषि की कन्या तथा सांख्यशास्त्र के प्रवर्तक कपिल मुनि की बहन सती अनुसूया इनके पिता व माता हैं। अत्रि मुनि का पुत्र होने की वजह से भी इनको आत्रेय भी पुकारा गया और दत्त व आत्रेय को मिलाकर दत्तात्रेय नाम हुआ।

वे त्रिदेवों में भगवान विष्णु के सतगुणी अंश बताए गए हैं। भगवान दत्तात्रेय स्मर्तृगामी हैं। वह अपने शरणागत भक्त के बुलाने या स्मरण करने भर से फौरन संकट दूर करते हैं। मान्यता है कि वे रोज सवेरे काशी में गंगा स्नान करते हैं। इनका बीजमन्त्र द्रां है।
महायोगी दत्तात्रेय अवधूत व श्री विद्या के आदि आचार्य हैं। दत्तात्रेय ने शिवजी के पुत्रों श्रीगणेश व कार्तिकेय को कई विद्याएं सिखाई। परशुराम को श्रीविद्या प्रदान की। कार्तवीर्य अर्जुन को तन्त्रविद्या सिखाई। भक्त प्रहलाद को अनासक्ति योग की शिक्षा देकर श्रेष्ठ राजा बनाया। सांकृति मुनि को भी अवधूत विद्या प्रदान की। रसायनज्ञ नागार्जुन को रसायन विद्या भी दत्त कृपा से ही मिली। गुरु गोरखनाथ को प्राणायाम, आसन, मुद्रा व समाधि, चतुरंग योग का मार्ग योगी दत्तात्रेय ने ही सिखाया।
इसी कड़ी में श्रीमद्भागवदपुराण में राजा यदु को उन्होंने बताया कि गुरु का क्या महत्व है। साथ ही , गुरु शब्द को समझाने के लिए अपने 24 गुरु बनाने के 24 रहस्य भी राजा को समझाए। अाइए जानते हैं क्या है दत्तात्रेय महाराज के वे 24 रहस्य….
धरती – सर्दी ,गर्मी ,बारिश को धेर्यपूर्वक सहन करने वाली ,लोगों द्वारा मल -मूत्र त्यागने और पदाघात जैसी अभद्रता करने पर भी क्रोध ना करने वाली ,अपनी कक्षा और मर्यादा पर निरंतर ,नियत गति से घूमने वाली पृथ्वी को मैंने गुरु माना है !
वायु (हवा)- अचल (निष्क्रिय ) होकर ना बेठना ,निरंतर गतिशील रहना ,संतप्तों को सांत्वना देना ,गंध को वहन तो करना पर स्वयं निर्लिप्त रहना। ये विशेषताएं मैंने पवन में पाई और उन्हें सीख कर उसे गुरु माना !

आकाश (गगन)- अनंत और विशाल होते हुए भी अनेक ब्रह्मांडों को अपनी गोदी में भरे रहने वाले ,ऐश्वर्यवान होते हुए भी रंच भर अभिमान ना करने वाले आकाश को भी मैंने गुरु माना है।

जल (पानी)- सब को शुद्ध बनाना ,सदा सरल और तरल रहना ,आतप को शीतलता में परिणित करना ,वृक्ष ,वनस्पतियों तक को जीवन दान करना ,समुद्र का पुत्र होते हुए भी घर घर आत्मदान के लिए जा पहुंचना -इतनी अनुकरणीय महानताओ के कारण जल को मैंने गुरु माना।

यम – वृद्धि पर नियंत्रण करके संतुलन स्थिर रखना ,अनुपयोगी को हटा देना ,मोह के बन्धनों से छुड़ाना और थके हुओं को अपनी गोद में विराम देने के आवश्यक कार्य में संलग्न यम मेरे गुरु हैं।

अग्नि – निरंतर प्रकाशवान रहने वाली , अपनी उष्मा को आजीवन बनाए रखने वाली , दवाव पड़ने पर भी अपनी लपटें उर्ध्वमुख ही रखने वाली ,बहुत प्राप्त करके भी संग्रह से दूर रहने वाली ,स्पर्श करने वाले को अपने रूप जैसा ही बना लेने वाली ,समीप रहने वालों को भी प्रभावित करने वाली अग्नि मुझे आदर्श लगी ,इसीलिए उसे गुरु वरण कर लिया।

चन्द्रमा – अपने पास प्रकाश ना होने पर भी सूर्य से याचना कर पृथ्वी को चांदनी का दान देते रहने वाला परमार्थी चन्द्रमा मुझे सराहनीय लोक-सेवक लगा।  विपत्ति में सारी कलाएं क्षीण हो जाने पर भी निराश होकर ना बैठना और फिर आगे बढ़ने के साहस को बार -बार करते रहना धेर्यवान चन्द्रमा का श्रेष्ठ गुण कितना उपयोगी है ,यह देख कर मैंने उसे अपना गुरु बनाया ।

सूर्य – नियत समय पर अपना नियत कार्य अविचल भाव से निरंतर करते रहना ,स्वयं प्रकाशित होना और दूसरों को भी प्रकाशित करना ,नियमितता ,निरंतरता ,प्रखरता और तेजस्विता के गुणों ने ही सूर्य को मेरा गुरु बनाया।

कबूतर – पेड़ के नीचे बिछे हुए जाल में पड़े दाने को देखकर लालची कबूतर आलस्यवश अन्यत्र ना गया और उतावली में बिना कुछ सोचे विचारे ललचा गया और जाल में फँस पर अपनी जान गवां बैठा यह देख कर मुझे ज्ञान हुआ की लोभ से,आलस्य से और अविवेक से पतन होता है ,यह मूल्यवान शिक्षा देने वाला कबूतर भी मेरा गुरु ही तो है।
अजगर – शीत ऋतु में अंग जकड जाने और वर्षा के कारण मार्ग अवरुद्ध रहने के कारण भूखा अजगर मिटटी खा कर काम चला रहा था और धेर्य पूर्वक दुर्दिन को सहन कर रहा था।  उसकी इसी सहनशीलता ने उसे मेरा गुरु बना दिया।

समुद्र (सागर) – नदियों द्वारा निरंतर असीम जल की प्राप्ति होते रहने पर भी, अपनी मर्यादा से आगे ना बढ़ने वाला ,रत्न राशि के भंडारों का अधिपति होने पर भी नहीं इतराने वाला , स्वयं खारी होने पर भी बादलों को मधुर जल दान करते रहने वाला समुद्र भी मेरा गुरु है।

पतंगा – लक्ष्य की प्राप्ति के लिए अपने प्राणों की परवाह न करके अग्रसर होने वाला पतंगा जब दीपक की लौ पर जलने लगा तो आदर्श के लिए ,अपने लक्ष्य के लिए उसकी अविचल निष्ठा ने मुझे बहुत प्रभावित किया।  जलते पतंगे को जब मैने गुरु माना तो उसकी आत्मा ने कहा इस नश्वर जीवन को महत्त्व ना देते हुए अपने आदर्श और लक्ष्य के लिए सदा त्याग करने को उद्धत रहना चाहिए।

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